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प्रत्येक
मनुष्य
अपने जीवन
का पूरी तरह
आनन्द लेना
चाहता है।
जीवन का पूरा
आनन्द सही
अर्थो में
तभी लिया
जा सकता है
जबकि व्यक्ति
विशेष का
स्वास्थ्य
अच्छा हो।
अच्छा
स्वास्थ्य
, अच्छें
स्वास्थ्य
सम्बन्धी
आचरण पर निर्भर
करता है।
हमारा दैनिक
आचरण-हमारा
रहन-सहन,
खान-पान,
व्यवहार
विचार आदि
हमारे स्वास्थ्य
को प्रभावित
करते हैं।
व्यक्तिगत
स्वच्छता
क्या है?
व्यक्तिगत
स्वास्थ्य
संबंधी आचरण
जैसे शरीर
की स्वच्छता,
दॉंतों की
सफाई, नाखूनों
तथा पैरो
की देखभाल,
भोजन, आहार,
व्यायाम,
विश्राम
एवं नींद
(निद्रा), ध्रूमपान
लत, मानसिक
विचार तथा
मद्यपान
संबंधी नियमों
का पालन व्यक्तिगत
स्वस्छता
के अन्तर्गत
आतें हैं।
इनके प्रति
लापरवाही
हमारे स्वास्थ्य
पर बुरा प्रभाव
डाल सकती
है। उदाहरण
के तौर पर
दॉंतों की
सफाई भरे
मैल में जमे
रोगाणुओं
से ऑंतों
में कृमि
तथा अन्य
विकार पैदा
हो सकते हैं।
''व्यक्तिगत
स्वच्छता''
दो शब्दों
से मिलकर
बना है ''व्यक्ति''
एवं ''स्वच्छता''
जिससे प्रकट
होता है कि
स्वास्थ्य
सफाई के सिद्वान्त
जो कि मनुष्यों
द्वारा व्यक्तिगत
स्तर पर
व्यवहार
में लिये
जाते हैं।
व्यक्तिगत
स्वच्छता
एवं स्वास्थ्य
के लिए व्यक्ति
को स्वयं
को ही प्रयत्नशील
होना पडता
है, अपने
को स्वयं
को ही साधन
जुटाने पडते
हैं एवं अपेक्षित
स्वास्थ्य
नियमों के
पालन में
लगा रहना
पडता है।
व्यक्तिगत
स्वास्थ्य
की आवश्यकता:-
व्यक्तिगत
स्वच्छता
एवं स्वास्थ्य
व्यक्ति
को निम्न
बातों में
सहायता करता
है।
-
एक
अच्छा सुडौल
शरीर बनाये
रखने में।
-
मांसपेशियों
में अच्छी
शक्ति बनाये
रखने में।
-
सुन्दर,
स्वच्छ
एवं स्वस्थ
मुख बनाये
रखने में
तथा दांतों
को नष्ट
होने से बचाने
में।
-
त्वचा
(चमडी) को
स्वस्थ
रखने एवं
रोगों से
मुक्त रखने
में।
-
ऑंख,
कान एवं नाक
को स्वस्थ
एवं रोगों
से मुक्त
रखने में।
-
व्यक्ति
में ऊर्जा
(गर्मी) शक्ति
को बनाये
रखने तथा
काय्र क्षमता
बढाने में।
-
शरीर
में रोगों
के खिलाफ
लडने की शक्ति
को बनाये
रखने तथा
संक्रमण
की रोकथाम
करने में।
व्यक्तिगत
स्वच्छता
संबंधी विभिन्न
पहलू एवं
कार्य:-
व्यक्तिगत
स्वास्थ्य
संवर्धन
(वृद्वि)
के लिए व्यक्ति
को अपनी स्वास्थ्य
एवं शारीरिक
क्रिया संबंधी
आवश्यकताओं
की पूति करनी
होती है ये
आवश्यकतायें
है- शुद्व
वायु, शुद्व
जल, शुद्व
संतुलित
आहार शारीरिक
स्वच्छता
, शारीरिक
परिश्रम,
संक्रामक
रोगों (छूत
के रोगों),
दुर्घटनाओं
एवं व्यवसयिक
आपदाओं से
बचाव, ज्ञानेन्द्रियों-ऑंख,
नाक, कान,
त्वचा, जीभ
आदि की सुरक्षा,
मानसिक सामाजिक
कुरीतियों
का त्याग
व स्वच्छ
पर्यावरण।
(1)
शुद्व एवं
स्वच्छ
वायु व जल:-
वायु
(हवा) प्राणीमात्र
के जीवन के
आधारहै तथा
जीवन को बनायें
रखने का प्रमुख
साधन है।
जीवन का दुसरा
आधार शुद्व
स्वच्छ
जल है। शुद्व
वायु व जल
प्रकृति
की अनुपम
देन है, उनको
दूषित होने
से बचाना
चाहिए। व्यक्तिगत
रूप में हमें
प्रातः सायं
खुले स्थानों
में नियमित
भम्रण, बाग-बगीचे
में विचरण
करके, पर्याप्त
मात्रा में
आक्सीजन
प्राप्त
करनी चाहिए
जो रक्त
को शुद्वि
हेतु आवश्यक
है।
शुद्व
व स्वच्छ
जल आंत व पेट
संबंधी संक्रामक
रोगों से
बचाने के
साथ हमारी
शारीरिक
आवश्यकताओं
की पूर्ति
भी करता है।
सामान्यतया
स्वस्थ
व्यक्ति
के लिये जल
की दैनिक
मात्रा लगभग
4 लीटर होती
है। गर्मी
के मौसम में
तथा गर्म
पर्यावरण
में काम वाले
व्यक्ति
को उसकी अधिक
आवश्यकता
पडती है।
(2)
जल स्वच्छ
व सुरक्षित
स्त्रोतों
का ही उपयोग
में लेना
चाहिए:-
स्वच्छ
सुरक्षित
एवं संतुलित
भोजन का सेवन
भी स्वास्थ्य
के लिये आवश्यक
है। हमारे
भोजन या आहार
में वे सभी
आवश्यक
तत्व होने
चाहिए जो
शरीर को सुरक्षा
प्रदान करें,
तथा ऊर्जा
(गर्मी) प्रदान
करें तथा
शारीरिक
वृद्वि एवं
विकास में
मदद करें।
(3)
शारीरिक
स्वच्छता:-
व्यक्तिगत
स्वच्छता
एवं स्वास्थ्य
के लिए शुद्व
जल शुद्व
वायु, संतुलित
आहार के साथ-साथ
शारीरिक
स्वच्छता
पर नियमित
रूप से ध्यान
देना अति
आवश्यक
है।
शरीर
की बाहरी
स्वच्छता
में त्वचा,
बाल, नाखुन,
मुंह, मसूढे,
दांत, जीभ,
ऑंख, कान,
नाक आदि की
नियमित सफाई
पर विशेष
ध्यान देना
जरूरी है।
(4)
त्वचा, बालों
एवं नाखुनों
की सफाई व
देखभाल:-
त्वचा
या चमडी, शरीर
की सुरक्षा
के साथ-साथ
शरीर के गन्दे
पदार्थो
को बाहर निकालती
है। त्वचा
शरीर का तापमान
बनायें रखती
है। पसीने
के साथ निकलने
वाले गन्दे
पदार्थ त्वचा
पर मैल के
रूप में जमने
लगता है एवं
बाहर धूल,
मिट्टी के
कण त्वचा
के छिद्रों
को बन्द
कर देते है
और पसीने
के निकलने
में रूकावट
पैदा करते
हैं। अतः
त्वचा की
नियमित सफाई
करनी चाहिए
प्रतिदिन
स्नान करना
चाहिए, अन्यथा
त्वचा से
बदबू आयेगी
तथा सफाई
के अभाव में
बाहरी रोगाणुओं
द्वारा फोडे,
फुन्सी,
दाद, खाज,
खुजली आदि
रोग जूंए
शरीर में
उत्पन्न
हो जायेगी
बालों को
नियमित साफ
रखना चाहिए।
प्रतिदिन
साफ कंघी
करें जिससें
जुंए न हो।
याद
रखें:-
-
प्रतिदिन
साफ पानी
से रगडकर
स्नान करें,
स्नान के
लिये उपयुक्त
साबुन जिसमें
क्षार की
मात्रा कम
हो, प्रयोग
में लेना
हितकर है।
-
बालों
को भी प्रतिदिन
भलीभांति
धोना आवश्यक
है, फिर सुखाकर
कंघी करनी
चाहिए।
-
नहाने
के बाद साफ
तौलिये से
या साफ कपडे
से शरीर को
रगडकर, पोंछकर
सुखाकर स्वच्छ
वस्त्र
धारण करने
चाहिए।
-
अपने
स्वयं का
ही तौलिया
काम में लेना
चाहिए।
(अ)
नाखुनों
व हाथ की सफाई:-
नाखुनों
से हम खुजलाते
हैं, खुरचते
है और अनेक
कार्यो में
इनका प्रयोग
करते हैं
अतः हमें
नाखुनों
के नीचे कई
प्रकार के
अवांछनीय
तत्व, मैल
आदि जमा हो
जाते है,
जिनमें रोग
उत्पन्न
करने वाले
कीटाणु भी
रहते हैं।
जो मुंह के
द्वारा हमारे
शरीर में
प्रवेश कर
हमें रोग
ग्रस्त
कर सकते है,
अतः नाखुनों
की समुचित
सफाई व कटाई
आवश्यक
है। हाथ हमारे
भोजन खाने
व अन्य कार्यो
के काम में
आतें हैं।
अतः हाथों
को गन्दे
व दूषित होन
से बचाने
के लिये तथा
रोगाणओं
को हाथों
द्वारा भोजन
के साथ पेट
में पहुंचन
से रोकने
के लिये तथा
पेट के रोगों
से शोच जाने
(टट्टी जाने,
मल त्यागने)
के बाद भोजन
करने से पूर्व,
भोजन पकाने
तथा परोसने
के पूर्व
हाथों को
साबुन व साफ
पानी से अवश्य
भली प्राकर
से धोना चाहिए।
साबुन न मिलने
पर हाथों
का राख से
भी धोया जा
सकता है, मिट्टी
का प्रयोग
हाथों को
धाने के लिये
नहीं करना
चाहिए।
(ब)
मुख, मसूढे
दांत व जीभ
की सफाई:-
प्रतिदिन
उठने के बाद
साफ पानी
से हाथ मुंह
धोना, कुल्ला
करना, ठन्डें
पानी से नेत्रों
को छींटे
लगाकर धोना
ताजगी लाती
है तथा, सुस्ती
दूर करता
है शौचादि
से निवृत
होने के बाद
दांतों,
मसूढों व
जिव्हा
की समुचित
सफाई करना
जरूरी है।
दांत में
दर्द की तकलीफ
आजकल आम बात
हो गयी है।
यदि जरा सी
सावधानी
बरती जाये
तो दांत बुढापे
में भी स्वस्थ
रखे जा सकते
है। दांतो
की सफाई के
लिये अच्छा
दंत ब्रुश
या दातुन
का प्रयोग
हितकर है।
ब्रुश के
साथ कोई भी
अच्छा दन्त
पाउडर या
दन्त क्रीम
प्रयोग करना
उचित है।
दंत मंजन
व दांतो की
सफाई प्रातः
भोजन करने
के पश्चात
करना आवश्यक
है। ऐसा करने
से भोजन के
कण दांतो
में फसे
नहीं रहकर
सडन पैदा
होने से रोकतें
है तथा उन
पर कीटाणु
का प्रभाव
नहीं रह सकता
है। अधिक
मीठा खाते
रहने व दांतो
की सफाई नहीं
करने से मीठे
के कण जो दांतों
में फसें
रह जाते हैं,
जिससे दांतों
में कीडा
लगने की सम्भावना
हो जाती है।
दांतो की
मजबूती के
लिए केल्शियम
एवं विटामीन
सी वाले पदार्थ
जैसे दूध,
मूली, गाजर
बन्द गोभी,
हरे पत्ते
वाली सब्जियॉं,
ऑंवला, नींबू,
टमाटर आदि
का प्रतिदिन
सेवन करना
चाहिए। रेत,
कोयले का
चूरा या राख
से दांत साफ
नहीं करने
चाहिए अन्यथा
दांतों की
ऊपरी परत
जल्द नष्ट
हो जायेगी
तथा मसूढे
आदि छिल जायेगं
दांतो पर
ब्रुश विधिवत
रूप से करना
चाहिए। इसके
लिए ब्रुश
को ऊपर से
नीचे और नीये
से ऊपर की
ओर घुमाने
से दांतों
की दीवारों
में फसें
सभी महीन
कण आसानी
से बाहर निकल
आते हैं।
दांतो का
भीतर और बाहरी
और साफ करना
चाहिए, पान,
सुपारी के
साथ तम्बाकू,
गुटके आदि
दांत व मसूडों
के लिये घातक
है, इनका सेवन
नहीं करना
चाहिए।
(स)
ऑंख, नाक कान
गले की देखभाल:-
आंखों
की समुचित
सफाई, धुल,
धूप, धुआं
व तेज प्रकाश
तथा मक्खियों
से ऑंखों
का बचाव आवश्यक
है ।आंखों
की सफाई करने
के लिए स्वयं
का स्वच्छ
रूमाल तथा
स्वच्छ
पानी प्रयोग
में लेना
चाहिए। कम
रोशनी में
एवं बहुत
तेज प्रकाश
में तथा पुस्तक
को बहुत निकट
रखकर पढना
सोते-सोते
पढना, चलती
गाडी या ट्रेन
में पढना,
ऑंखों को
कमजोर बनाता
है। ऑंखों
की निकट व
दूर की दृष्टि
जांच नेत्र
चिकित्सक
से नियमित
रूप से कराकर
चिकित्सक
की सलाह अनुसार
चश्मा आदि
लेना चाहिए।
तेज धूप एवं
धुल से बचने
के लिये धूप
चश्में
का प्रयोग
करना लाभदायक
है। घर में
धुऑं रहित
चुल्हे
का प्रयोग
करना चाहिए
प्रयलित
ऑंखों के
रोगों का
उपचार नेत्र
चिकित्सक
से कराना
चाहिए। ऑंखें
के लिये विटामीन
ए युक्त
खाद्य पदार्थ-
गाजर, आम, पपीता,
पत्तेदार
सब्जियॉं,
पीले फल,
दूध, मक्खन
घी आदि का
प्रयोग करना
चाहिए। नाक
कान गला का
पारस्परिक
संबंध जुडा
हुआ है, यदि
नाक व गले
में कोई संक्रमण
हो तो वह कान
के भीतरी
भाग में भी
पहुंच सकता
है। अधिकांश
नजला, जुकाम,
खांसी आदि
के संक्रमण
होता वह कान
के भीतरी
भाग में भी
पहुंच सकता
है। कान की
सफाई पर विशेष
ध्यान देना
चाहिएं।
कान से मल
निकालने
के लिये नूकीली
वस्तु का
प्रयोग नहीं
करना चाहिए।
भीड भरे स्थानों,
शोरगुल से
दूर रहना
चाहिए नाक
की सफाई हेतु
स्वच्छ
रूमाल का
प्रयोग करना
चाहिए इधर-उधर
नहीं थूंकना
चाहिए।
(द)
मानसिक स्वास्थ्य
व मादक वस्तुओं
का त्याग:-
मनुष्य
का चिन्ता,
क्रोध, दुःख,
घबराहट,
जल्दबाजी
आदि से बचते
हुये समाज
से अच्छा
व्यवहार
करना चाहिए
ईर्ष्या,
जलन, कुढन,
चुगली, चापलूसी
से मनुष्य
को बचना चाहिए।
मादक
वस्तुयें
शराब, भांग,
गांजा, अफीम,
हेरोइन,
चरस, धुम्रपान
व नशीली दवाओं
के सेवन से
अवश्य बचना
चाहिए, ये
सब स्वास्थ्य
के लिए घातक
है। इनके
सेवन से मानव
कभी-कभी तो
सेक्स संबंधी
अनैतिकता
भी कर बैठता
है, मानसिक
स्थिति डावांडोल
हो जाती है।
अतः इन वस्तुओं
का सेवन नहीं
करना चाहिए
तथा सामाजिक
कुरीतियों
का भी मानव
को त्याग
करना चाहिए।
उपरोक्त
वर्णित सभी
कार्य व सिद्वांत
व्यक्तिगत
स्वास्थ्य
को बनाये
रखने में
मददगार होते
हैं। कहा
गया है कि
स्वास्थ्य
खरीदा नहीं
जा सकता है।
अतः व्यक्तिगत
स्वास्थ्य
क नियमों
का पालन करनें
से व्यक्ति
स्वस्थ
रह सकता है।
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